स्वतंत्र बोल
रायपुर 4 अक्टूबर 2026: रायपुर विकास प्राधिकरण (RDA) की एक नगर विकास योजना को लेकर ईएनटी विशेषज्ञ और समाजसेवी डॉ. राकेश गुप्ता ने सवाल उठाए हैं। उनका दावा है कि एक मंत्री की पत्नी निदेशक वाली कंपनी राधिका पैलेस प्राइवेट लिमिटेड की कचना-नालापारा में करीब 1.33 एकड़ जमीन को योजना में शामिल किया गया है। डॉ. गुप्ता के अनुसार, इस जमीन के बदले 150 फीट चौड़ी प्रस्तावित MR-43 सड़क पर सड्डू चौक के पास 23,327 वर्गफीट का प्लॉट क्रमांक 25 आवंटित किया जाना प्रस्तावित है। उनका कहना है कि सड़क बनने के बाद इस प्लॉट की कीमत 20 करोड़ रुपये से अधिक हो जाने की संभावना है। मामला सामने आने के बाद RDA ने योजना को लेकर देर रात एक विज्ञप्ति जारी की। इसके बाद डॉ. गुप्ता ने जमीन के बदले प्रस्तावित प्लॉट, योजना की जरूरत और भू-स्वामियों के हितों को लेकर कई सवाल उठाए।
संकरी सड़क की जमीन के बदले 150 फीट सड़क पर प्लॉट क्यों?
डॉ. गुप्ता ने राधिका पैलेस प्राइवेट लिमिटेड की कचना-नालापारा स्थित जमीन की पहुंच का फोटो जारी किया। उन्होंने सवाल किया कि यदि योजना में 12 मीटर चौड़ी सड़क का प्रावधान है, तो कंपनी की संकरी सड़क से जुड़ी जमीन के बदले 12 मीटर सड़क पर ही प्लॉट क्यों नहीं दिया गया। उन्होंने यह भी पूछा कि कंपनी की जमीन के बदले करीब एक किलोमीटर दूर सड्डू चौक के पास 45 मीटर यानी 150 फीट चौड़ी प्रस्तावित सड़क पर प्लॉट क्रमांक 25 का आवंटन क्यों प्रस्तावित किया गया। डॉ. गुप्ता ने RDA के उस पक्ष पर भी सवाल उठाया कि फिलहाल योजना को लेकर आपत्तियां बुलाई गई हैं और आपत्ति योजना से प्रभावित पक्ष ही दर्ज कर सकता है। उन्होंने पूछा कि सड्डू चौक के पास 150 फीट चौड़ी सड़क पर प्लॉट मिलने की स्थिति में प्रभावशाली व्यक्ति की कंपनी खुद आपत्ति क्यों दर्ज करेगी?
कंपनी की जमीन को योजना में शामिल करना जरूरी क्यों था?
डॉ. गुप्ता ने अधिकारियों से यह भी सवाल किया कि संबंधित कंपनी की जमीन को नगर विकास योजना में शामिल करने की जरूरत क्यों पड़ी। उन्होंने पूछा कि क्या इस जमीन को योजना में शामिल किए बिना योजना को पूरा करना संभव नहीं था। उनका कहना है कि जिम्मेदार अधिकारियों को स्पष्ट करना चाहिए कि कंपनी की जमीन को योजना में शामिल करने के पीछे क्या आवश्यकता थी।
4.5 किलोमीटर सड़क के लिए 95 हेक्टेयर की योजना पर सवाल
डॉ. गुप्ता ने योजना की प्रकृति पर भी सवाल उठाए हैं। उनके अनुसार यह नगर विकास योजना के बजाय सड़क विकास योजना जैसी दिखाई देती है। उन्होंने बताया कि MR-43 के तहत सड़क के किनारे की करीब 18 हेक्टेयर जमीन लेकर मुख्य रूप से 4.5 किलोमीटर लंबी MR-43 सड़क बनाई जानी है। ऐसे में 95.271 हेक्टेयर क्षेत्र में इतनी बड़ी नगर विकास योजना लेने की जरूरत पर उन्होंने सवाल उठाया। डॉ. गुप्ता के अनुसार योजना में भू-स्वामियों से 60 प्रतिशत जमीन ली जा रही है और 40 प्रतिशत जमीन वापस की जा रही है। उन्होंने इसकी तुलना गुजरात में जमीन वापसी की व्यवस्था से करते हुए कहा कि वहां व्यवस्था इसका उल्टा है। उनका आरोप है कि यह छत्तीसगढ़ का पहला ऐसा उदाहरण है, जहां नगर विकास योजना के नाम पर भू-स्वामियों से जमीन लेकर मास्टर प्लान की मेजर रोड बनाई जा रही है। उन्होंने कहा कि यदि सड़क निर्माण के लिए भूमि की जरूरत है तो वैधानिक प्रक्रिया के तहत आवश्यक जमीन लेकर सार्वजनिक धन से सड़क बनाई जा सकती है। उन्होंने सवाल उठाया कि जनता से टैक्स किसलिए लिया जाता है और RDA का गठन धन अर्जन के लिए नहीं किया गया है।
गार्डन, स्कूल और डेयरी के लिए जमीन कहां है?
डॉ. गुप्ता ने योजना में प्रस्तावित सुविधाओं को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने देवेंद्र नगर, शैलेंद्र नगर और कमल विहार का उदाहरण देते हुए कहा कि पहले नगर विकास योजनाएं सुव्यवस्थित और सेक्टर आधारित आवासीय क्षेत्रों के विकास के लिए लाई गई थीं। उनके अनुसार मौजूदा योजना मुख्य रूप से मेजर रोड के निर्माण तक सीमित दिखाई देती है। उन्होंने छत्तीसगढ़ नगर तथा ग्राम निवेश अधिनियम, 1973 की धारा 49(3)(e) का हवाला देते हुए पूछा कि योजना में गार्डन, डेयरी, स्कूल और परिवहन सुविधाओं के लिए जमीन चिन्हित और आवंटित क्यों नहीं की गई। डॉ. गुप्ता का आरोप है कि प्राधिकरण इन स्थानों को बाद में बेचकर कमाई करना चाहता है।
भू-स्वामियों की जमीन से RDA को 800 करोड़ रुपये के लाभ का दावा
डॉ. गुप्ता के अनुसार 95 हेक्टेयर की योजना में RDA ने करीब 17.50 हेक्टेयर यानी लगभग 18.80 लाख वर्गफीट जमीन अपने पास रखी है। इसमें करीब 190 मिश्रित भू-उपयोग वाले बिक्री योग्य भूखंड बताए गए हैं। उन्होंने कहा कि ये भूखंड मुख्य मार्गों और चौराहों की प्राइम लोकेशन पर हैं। उनके अनुसार करीब 5,000 रुपये प्रति वर्गफीट की न्यूनतम दर से इनकी अनुमानित कीमत करीब 1,000 करोड़ रुपये बैठती है। डॉ. गुप्ता ने बताया कि RDA के अनुसार सड़क और अन्य विकास कार्यों पर करीब 208 करोड़ रुपये खर्च होने हैं। इसी आधार पर उन्होंने दावा किया कि भू-स्वामियों की जमीन की कीमत पर RDA को करीब 800 करोड़ रुपये का लाभ होगा। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि योजना का मुख्य उद्देश्य मेजर रोड का निर्माण है तो भू-स्वामियों की जमीन से इतनी बड़ी बिक्री योग्य संपत्ति तैयार कर RDA के पास रखने का औचित्य क्या है।
बड़े अंतिम भूखंडों को लेकर भी सवाल
डॉ. गुप्ता ने अंतिम भूखंड आवंटन को लेकर भी सवाल उठाए। उनके अनुसार निजी भू-स्वामियों को 109 अंतिम भूखंड दिए जा रहे हैं। इनका कुल क्षेत्रफल करीब 77.69 एकड़ है। उन्होंने बताया कि इनमें 15 भूखंड एक एकड़ से बड़े हैं और इनका कुल क्षेत्रफल 54.25 एकड़ है। यानी करीब 70 प्रतिशत भूखंड एक एकड़ से बड़े हैं। इनमें 11.50, 7 और 3-3 एकड़ तक के बड़े भूखंड शामिल हैं। डॉ. गुप्ता के अनुसार इन भूखंडों में आंतरिक सड़क, नाली, पानी और बिजली जैसी सुविधाओं के विकास का प्रावधान नहीं रखा गया है। उनका कहना है कि बाद में इन सुविधाओं का विकास भू-स्वामियों को अपने खर्च पर करना होगा। उन्होंने सवाल उठाया कि ऐसी स्थिति में प्राधिकरण इन्हें किस अर्थ में विकसित भूखंड कह रहा है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि करीब 28 एकड़ जमीन के बदले 11.50 एकड़ का अंतिम भूखंड मिलने पर, भू-स्वामी को लेआउट विकसित करने में आंतरिक सड़क और अन्य सुविधाओं के लिए जमीन देनी पड़ सकती है। उनके अनुसार ऐसी स्थिति में करीब 6 एकड़ ही बिक्री योग्य जमीन बच सकती है।
संयुक्त प्लॉट के लिए सहमति ली गई या नहीं?
डॉ. गुप्ता ने भू-स्वामियों की खंडित जमीन को एकीकृत करने की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाया। उनके अनुसार प्राधिकरण का कहना है कि अलग-अलग खसरा नंबरों पर मौजूद भू-स्वामियों की जमीन को एकीकृत कर पूरे रकबे के लिए एक अंतिम भूखंड आवंटित किया गया है। उन्होंने सवाल किया कि संयुक्त प्लॉट देने से पहले धारा 50(3)(ii)(h) के तहत भू-स्वामियों से सहमति ली गई है या नहीं। डॉ. गुप्ता ने अधिकारियों से अपील की है कि वे इस पूरी प्रक्रिया को लेकर आत्ममंथन करें और यह देखें कि जो किया जा रहा है, वह नैतिक रूप से सही है या नहीं।




