स्वतंत्र बोल
मुंबई 26 सितंबर 2026 : भारतीय लोक-कथाओं के रहस्य और घने जंगलों के खौफ पर आधारित थ्रिलर फिल्म ‘द वन’ आखिरकार सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है। अपनी घोषणा के बाद से ही फिल्म ने अपने अनोखे मिस्ट्री-थ्रिलर जॉनर और भव्य विजुअल्स से दर्शकों में जबरदस्त कौतूहल पैदा कर दिया था। थिएटर में जंगल की रहस्यमयी ताकतों का माहौल तो सटीक बनता है, लेकिन देखने के बाद यह सवाल उठता है कि क्या फिल्म अपनी पूरी क्षमता को भुना सकी। शानदार सिनेमैटोग्राफी और बड़े कैनवस के बावजूद 5 अहम मोर्चों पर चूक की वजह से यह फिल्म ब्लॉकबस्टर बनने से चूक जाती है।
सेकंड हाफ में स्क्रीनप्ले की सुस्त रफ्तार
फिल्म का पहला हाफ दर्शकों को बांधने और जंगल का खौफनाक माहौल तैयार करने में पूरी तरह सफल रहता है। इंटरवल तक दर्शक आगे की कहानी जानने को लेकर उत्सुक रहते हैं। हालांकि, दूसरे हाफ की शुरुआत होते ही कहानी अपनी रफ्तार खो देती है। रहस्यों की परतें तेजी से खुलने के बजाय एक ही जगह घूमती महसूस होती हैं। अगर सेकंड हाफ की एडिटिंग कसी होती और दृश्यों का दोहराव छांट दिया जाता, तो शुरुआत का रोमांच अंत तक बना रहता।
बैकस्टोरी और लोक-परंपराओं की सतही प्रस्तुति
लोक-कथा आधारित थ्रिलर की असली ताकत उसकी जड़ों में छिपी होती है। फिल्म में जिस प्राचीन रहस्य और जंगल की शक्ति का खौफ दिखाया गया है, दर्शक उसके इतिहास की गहराई में जाना चाहते थे। कहानी में उस मिथक और परंपरा के बैकग्राउंड को काफी जल्दबाजी में समेट दिया गया। यदि इस लोक-मान्यता के इतिहास को कुछ और मजबूत सीन्स के जरिए स्थापित किया जाता, तो खौफ दर्शकों के जेहन में ज्यादा गहरा असर छोड़ता।
किरदारों के बीच इमोशनल कनेक्ट की अनदेखी
थ्रिलर या हॉरर फिल्मों में दर्शक तब तक पूरी तरह जुड़ाव महसूस नहीं करता, जब तक वह पर्दे पर मौजूद किरदार के खतरे को खुद से न जोड़ ले। ‘द वन’ में मुख्य किरदारों के आपसी रिश्ते और उनकी व्यक्तिगत जद्दोजहद उतनी गहरी नहीं उभर पाती। जब किरदार संकट में फंसते हैं, तो दर्शकों के मन में वैसी घबराहट पैदा नहीं होती जैसी होनी चाहिए थी। किरदारों के इमोशन पर थोड़ा और वक्त दिया जाता तो फिल्म अधिक प्रभावी साबित होती।
गंभीर माहौल में जबरन डाला गया हल्का-फुल्कापन
फिल्म का मूल मिजाज काफी गंभीर, डार्क और रहस्यमयी है। इसके बावजूद कहानी के बीच-बीच में हल्का-फुल्कापन या कॉमिक एंगल डालने की कोशिश की गई है, जो बने-बनाए तनावपूर्ण माहौल को कमजोर कर देती है। दर्शक जैसे ही जंगल के रहस्य में डूबने लगता है, गैर-जरूरी संवाद या दृश्य उस पूरे बिल्ड-अप का मजा किरकिरा कर देते हैं। अगर फिल्म अपनी डार्क टोन पर शुरू से अंत तक टिकी रहती, तो इसका असर कहीं ज्यादा होता।
क्लाइमैक्स में जल्दबाजी और वीएफएक्स पर ज्यादा निर्भरता
फिल्म का आखिरी आधा घंटा कहानी का सबसे अहम मोड़ था। क्लाइमैक्स में कहानी को लॉजिकल कंक्लूजन देने के बजाय मेकर्स ने भारी-भरकम वीएफएक्स और विजुअल शोरगुल का सहारा लिया। जिस गुत्थी को शुरुआती हिस्से में नजाकत से बुना गया था, उसे सुलझाने में वह गहराई नजर नहीं आई। क्लाइमैक्स को वीएफएक्स के तूफान के बजाय तीखे साइकोलॉजिकल ट्विस्ट के साथ खत्म किया जाता, तो फिल्म का अंत बेहद प्रभावशाली होता।


