स्वतंत्र बोल
बिलासपुर,23 मई 2026: एक शब्द ने ऐसा बवाल खड़ा किया कि गांव रणभूमि में बदल गया। लाठी, तलवार, फरसा और लोहे की रॉड से हुए खूनी हमले में कई लोग घायल हुए थे। अब इस सनसनीखेज बलवा मामले में करीब 20 साल बाद हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने आरोपियों को राहत देते हुए जेल में बिताई गई अवधि को ही सजा मान लिया है।
पूरा मामला जांजगीर-चांपा जिले के पामगढ़ थाना क्षेत्र के ग्राम धाराशिव का है। 7 जुलाई 2005 को गांव में विष्णु प्रसाद के घर उनकी दादी हराबाई का वार्षिक श्राद्ध कार्यक्रम चल रहा था। घर में रिश्तेदार और ग्रामीण मौजूद थे। इसी दौरान खेती का काम करने वाले श्रवण राठौर ने विष्णु प्रसाद को बताया कि गांव के नेगीराम ने उसे “चापलूस” कहा है।
शाम होते-होते यही बात विवाद की जड़ बन गई। विष्णु प्रसाद ने नेगीराम से पूछ लिया कि आखिर उसने ऐसा क्यों कहा। मामला उस वक्त शांत हो गया, लेकिन रात होते ही गांव में खौफनाक बवाल शुरू हो गया।
बताया गया कि विष्णु प्रसाद अपने साथियों महारथी, विनोद और संतोष के साथ पान दुकान पहुंचे थे, तभी गांव के कई लोग वहां जमा हो गए और गाली-गलौज शुरू कर दी। देखते ही देखते मामला हिंसक झड़प में बदल गया।
आरोप है कि कामता राठौर, कौशल, नेगीराम, सुनील, दिनेश, बबला, बैलिस्टर, दिलीप, बनवासी, अनिल पांडे, लाली चौहान और जुगुनू समेत कई लोग हथियार लेकर मौके पर पहुंचे। किसी के हाथ में फरसा था, किसी के पास तलवार, तब्बल, लोहे की रॉड और लाठी-डंडे थे।
हमले में विष्णु प्रसाद, महारथी और विनोद को बेरहमी से पीटा गया। बीच-बचाव करने पहुंचीं राधाबाई, हीराबाई, उत्तरा बाई और कमलाबाई भी हमले का शिकार हो गईं। मारपीट इतनी भयानक थी कि विष्णु प्रसाद जमीन पर गिर पड़े और आरोपी उन्हें मरा समझकर फरार हो गए।
घटना के बाद गांव में अफरा-तफरी मच गई। पुलिस मौके पर पहुंची और घायलों को अस्पताल में भर्ती कराया। जांच के बाद मामला कोर्ट पहुंचा, जहां 17 मार्च 2008 को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश जांजगीर ने आरोपियों को दोषी ठहराते हुए अलग-अलग धाराओं में सजा सुनाई थी।
अब इस मामले में हाईकोर्ट ने लंबा समय बीत जाने, अपील 2008 से लंबित रहने और आरोपियों द्वारा पहले ही एक महीने से ज्यादा जेल में बिताने को आधार मानते हुए राहत दे दी। अदालत ने जेल में बिताई गई अवधि को ही पर्याप्त सजा मानते हुए अपील आंशिक रूप से स्वीकार कर ली।


