जहाँ गोल्ड मैडल और पीएचडी स्कॉलर की चर्चा होनी थी वहा अतिथियो को लेकर उपजा है विवाद..

राहुल गोस्वामी

रायपुर 28 मई 2022. पत्रकारिता विश्वविद्यालय में एक बार फिर बवाल मचा हुआ है। इस बार बवाल दीक्षांत समारोह और उसमे शामिल होने वाले अतिथियों को लेकर है। कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय का 5 वां दीक्षांत समारोह 30 मई को राजधानी के दीनदयाल उपाध्याय ऑडिटोरियम में होगा। पत्रकरिता विश्वविद्यालय में हंगामा पहली बारे नहीं है इससे पहले भी अनेको बार ऐसे राजनितिक बवाल मच चूका है। इस बार के उपजे हंगामे से दीक्षांत में शामिल होने वाले अतिथि और मैडल पाने वालो को निराशा हो रही है। दीक्षांत में गोल्डमेडलिस्ट और पीएचडी रिसर्च स्कालर की चर्चा होनी चाहिए पर यहाँ विश्वविद्यालय प्रबंधन की लापरवाही ने पुरे समारोह को विवादास्पद बना दिया है। किसी भी विश्वविद्यालय में दीक्षांत समारोह की तैयारी महीनो पहले शुरू हो जाती है, अतिथियों की लिस्ट और उनकी अनुमति पहले ली जाती है पर यहाँ ऐसा नहीं हुआ। 4 मई को कुलसचिव डॉ आनंद शंकर बहादुर ने दीक्षांत समारोह का अधिसूचना जारी किया और वे धनबाद चले गए। इस दौरान प्रभारी कुलसचिव त्रिपाठी ने कोशिशे की पर उनसे अपेक्षानुरूप नहीं हो पाया। विश्वविद्यालय प्रबंधन ने अतिथियों से पूर्व चर्चा भी की। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से विश्वविद्यालय से कोई भी जिम्मेदार व्यक्ति मिलने नहीं पंहुचा और ना ही उनसे चर्चा की जबकि कुलपति और कुलसचिव का नैतिक जिम्मेदारी थी कि वे सीएम से दीक्षांत को लेकर चर्चा समय देने का आग्रह करते पर ऐसा हुआ नहीं। प्रबंधन ने मुख्यमंत्री कार्यालय को दीक्षांत समारोह का आमंत्रण पत्र भेज अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो गए, ऐसे में हंगामा होना ही था।

बताते है कि प्रबंधन ने दीक्षांत में होने वाले खर्च को लेकर ना कोई टेंडर किया ना ही 5 मई को हुए कार्य परिषद् की बैठक में इस विषय में कोई जानकारी दी अब सदस्यों को आमंत्रण मिलने पर इसकी दीक्षांत की जानकारी हुई है। ऐसे में अगर सदस्य मंच पर न दिखे तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। राजभवन द्वारा कुलपति नियुक्ति के बाद राज्य सरकार ने कुलसचिव को ये सोचकर बिठाया कि जो संतुलन बना सके पर ऐसा न हुआ। जिसे बैठाया वही अपना संतुलन बिगाड़ बैठे है ऐसे में किरकिरी तो होना ही है। राजधानी के कार्यक्रम में मुख्यमंत्री को आमंत्रित नहीं करना मनमानी और लापरवाही की पराकाष्ठा है। दीक्षांत को लेकर उपजे विवाद में जितने जिम्मेदार कुलसचिव है उतने ही जिम्मेदार कुलपति भी है क्योकि उन्होंने कभी आगे बढ़कर परिस्थियों को नहीं संभाला। मीडिया रिपोर्ट्स में आ रहे कुलसचिव डॉ आनंद बहादुर के बयान उनकी गंभीरता और कार्यशैली को दर्शाता है। ऐसे में उच्च शिक्षा विभाग और जिम्मेदारों को सज्ञान लेना चाहिए।

 

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