रायपुर 18 जून 2022. जब आम आदमी शासन और प्रशासन से गुहार लगाकर थक जाता है तब वह न्यायालय की शरण में जाता है, इस उम्मीद से कि वहा सुनवाई होगी और उसे न्याय मिलेगा। न्यायालय सुनवाई कर आदेश पारित करे तब उसके पालन की जिम्मेदारी प्रशासन की होती है और जब न्यायालय द्वारा पारित आदेशों पालन ना हो तो व्यक्ति का प्रशासन से विश्वास डगमगा जाता है।
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रोजगार एवं तकनीकी शिक्षा विभाग में चार कर्मियों की नियुक्ति साल 2014 में हुई, उन्हें पूर्व के भर्ती नियमो के अनुसार अगले पांच सालो बाद प्रशिक्षण अधिकारी पद पर पदोन्नत होना था। पदोन्नति के पूर्व ही विभाग ने पदों में संशोधन किया। सही समय पर पदोन्नति से वंचित कर्मचारी सुप्रिया प्रसाद , दौलत जोशी, महेंद्र बागले और दिनेश कुमार उच्च न्यायालय पहुंच गए। न्यायालय ने उनकी याचिका पर सुनवाई की, शासन और याचिकाकर्ता को सुना और प्रशिक्षण अधिकारी पद पर पदोन्नत करने का आदेश पारित कर केस निराकृत कर दिया। न्यायालय के आदेशों से उत्साहित याचिकाकर्ता विभाग प्रमुख आईएएस अवनीश शरण के समक्ष अभ्यावेदन प्रस्तुत कर पदोन्नति की गुजारिश की। ऐसे में संचालक ने यह कहते अभिवेदन निरस्त कर दिया कि न्यायालय में तथ्यों को छिपाया गया और पूर्व में पदोन्नति दी जा चुकी है ऐसे में अभ्यावेदन निरस्त किया जाता है।
अब सवाल उठता है कि क्या ऐसा संभव है? क्या न्यायालय में तथ्य छिपाये जाते है और माननीय ऐसे ही गलत आदेश पारित करती है? किसी भी दृष्टिकोण से संभव नजर नहीं आता, क्योकि न्यायालय में संबंधित विभाग का अधिकारी (ओआईसी) और महाधिवक्ता कार्यालय से वकील शासन का पक्ष रखता है, दोनों का पक्ष सुनाने के बाद ही न्यायालय आदेश पारित करती है। विभाग प्रमुख के आदेश से स्पष्ट होता है कि वे न्यायालय और उनके आदेशों को नहीं मानते या अपने से छोटा समझते है। भारतीय समाज में अपने से छोटे की बाते सुनना और मानना बड़े अपने लिए जरुरी नहीं समझते। शायद यही एक कारण हो सकता है की चतुर्थ श्रेणी के अनुसूचित जाति और जनजाति से संबंध रखने वाले कर्मचारीयो को न्यायालय के आदेशों के बाद भी न्याय नहीं मिल रहा है। सामान्य प्रशासन विभाग विभाग ने कई बार स्पष्ट तौर पर विभाग प्रमुखों को न्यायालयीन आदेशों की तामीली करने में देर नहीं करने निर्देश जारी किया। उसके बाद ऐसी स्थिति हावी अफसरशाही को दर्शाती है।
