रायपुर 16 मार्च 2022. स्मार्ट बोर्ड खरीदी में गड़बड़ी सार्वजनिक होने के बाद रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय में हड़कंप मचा हुआ है। गड़बड़ी में शामिल अधिकारी दामन बचाने में जुटे है तो प्रबंधन मामले को रफादफा करने में। स्मार्ट बोर्ड खरीदी में गड़बड़ी में उजागर होने के बाद प्रबंधन ने पुरे मामले पर चुप्पी साध ली है। वही गड़बड़ी के कुलपति अधिकारियो को जिम्मेदार ठहरा रहे है। कुलपति डॉ. केशरीलाल वर्मा ने कहा कि
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“विज्ञापन जारी करने, खरीदने और टेंडर फाइनल करने का काम कुलसचिव, सीपीसी और संबंधित अधिकारी करते है, फिर सबसे अंत में फाइल मेरे पास आती है। वित्त नियंत्रक द्वारा ओके करने के बाद भुगतान की स्वीकृति दिया हु। बेवजह गड़बड़ी में मेरा नाम शामिल किया जा रहा है।”
दरअसल विकास विभाग प्रभारी उपकुलसचिव शैलेन्द्र पटेल और कुलसचिव गिरीशकांत पांडेय ने नियमो को दरकिनार कर टेंडर प्रक्रिया किया। टेंडर में शामिल अधिकारियो द्वारा की गई आपत्ति को पैसा लेप्स का डर दिखाकर सब अनुसना किया गया। कुलसचिव ने कुलपति के बिना अनुमोदन के कार्यादेश जारी कर दिया। और अंत में दबावपूर्वक भुगतान भी कर दिया गया।
बताते है कि तत्कालीन वित्त नियंत्रक उमेश अग्रवाल ने उपकुलसचिव और कुलसचिव द्वारा किये गए गड़बड़ी को लेकर कुलपति केशरीलाल वर्मा को ब्रीफ किया था पर कुलपति ने अनसुना कर दिया.. जबकि कुलपति को अधिकार था कि नियमो का उल्लंघन करने और सीपीसी द्वारा आपत्ति करने पर टेंडर निरस्त कर दोबारा रिटेंडर करते, पर ऐसा नहीं किया गया। अब स्वयं को आर्थिक अनियमितता पर घिरते देख कुलपति बचने की कोशिश में लगे है।
कुलपति ने क्यों साधी चुप्पी..?
खरीदी में अनियमितता सार्वजनिक होने के बाद भी कुलपति ने ना कोई जाँच समिति बनाया है ना ही संबंधित कर्मियों पर कार्यवाही किया है। विषय विशेषज्ञों की माने तो नियमानुसार कुलपति उपकुलसचिव को निलंबित कर जाँच समिति गठित कर, कुलसचिव गिरीशकांत पांडेय पर अनुशासनात्मक कार्यवाही संबंधी पत्राचार उच्च शिक्षा विभाग को कर सकते है। विश्वविद्यालय की धूमिल होती छवि से इतर कुलपति की चुप्पी सवालो को जन्म दे रही है। जो उनके दोबारा कुलपति बनने की संभावनाओं को कम कर रही है।
कुलपति को जानकारी थी- वित्त नियंत्रक
गड़बड़ियों को लेकर तत्कालीन वित्त नियंत्रक उमेश अग्रवाल ने कहा कि अनुमति और नियमो के उल्लंघन पर मैंने लगातार नोटशीट में लिखा पर उस पर ध्यान नहीं दिया गया। वीसी के बिना अनुमोदन कार्यादेश की जानकारी कुलपति जी को दिया था.. और मैंने भुगतान भी महीनो तक रोक दिया था।”
