स्वतंत्र बोल
रायपुर 16 अगस्त 2022. साल 2015 में बोरझरा के बाबा बासुकिनाथ टायर फ़ैक्ट्री में हुए भीषण हादसे में तीन मजदुर जिंदा जल गए। हादसा इतना भयानक था की मौके से मजदूरों को भागने का मौका नही मिला और मेटाडोर चालक को गाड़ी से उतरने का। गाडी में बैठे-बैठे ही जिंदा जल गया, बचा था तो सिर्फ नरकंकाल। इस भयानक हादसे में मजदुर प्रभा साहू, हेल्पर तरुण सोनी और मेटाडोर चालक दिलीप मिश्रा की असमय मौत हुई थी। घटना के सात साल बाद फ़ैक्ट्री संचालक भालेंद्र उपाध्याय और धर्मेद्र उपाध्याय को दोषमुक्त कर दिया गया है। कोर्ट के आदेशों की कॉपी स्वतंत्र बोल को मिली है जिसमे स्पष्ट है कि जाँच में लीपापोती की गई, जिसका लाभ फ़ैक्ट्री संचालक उपाध्याय बधुओं को मिला। कोर्ट ने प्रारंभिक जाँच और साक्ष्यों के आधार पर दोनों को बा-ईज्जत बरी कर दिया है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि उन चार लोगो की मौत का जिम्मेदार कौन है?
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10 जुलाई 2015 को सुबह साढ़े 11 बजे उरला थाना क्षेत्र के बोरझरा के बाबा बासुकीनाथ टायर फ़ैक्ट्री में विस्फोट हुआ, विस्फोट इतना जबरदस्त था की मजदूरों को संभलने का मौका नहीं मिला और चंद सेकेंड में सब कंकाल में बदल गए। अवैध तरीके से संचालित इस फ़ैक्ट्री में पुराने टायरों से तेल निकालने का काम होता था जबकि इस तरह का काम पूरी तरह प्रतिबंधित है, उसके बाद भी फ़ैक्ट्री वह विगत चार सालो से संचालित हो रही थी। इस फ़ैक्ट्री के मालिक भालेंद्र और धर्मेंद्र के पिता संतोष कुमार उपाध्याय तत्कालीन में पर्यावरण विभाग में क्षेत्रीय प्रबंधक रहे, ऐसे में बेटे की कंपनी बिना रोकटोक के बद-दस्तूर चलती रही। अधिकारी के बेटो की कंपनी से होने पर्यावरण विभाग के अफसरों के कभी झाकने की कोशिश भी नहीं कि फ़ैक्ट्री में आखिर बनता क्या है। घटना के बाद उरला पुलिस ने फ़ैक्ट्री संचालक भालेंद्र उपाध्याय के खिलाफ अपराध क्रमांक 147/2015 धारा 304ए, 287,338 अंतर्गत अपराध पंजीबद्ध कर संचालको की गिरफ्तारी की। हादसे में बुरी तरह जले प्लांट क कथित मैनेजर पुपेन्द्र तिवारी ने भी अस्पताल में दम तोड़ दिया। हादसे के बाद पुलिस ने भालेंद्र और पुष्पेंद्र तिवारी को गिरफ्तार किया था। कंपनी के दस्तावेजों में भालेंद्र के भाई धर्मेद्र भी बराबर के हिस्सेदार थे, पर अप्रत्याशित रूप से हादसे के दो महीने पहले ही उन्होंने कंपनी से अलग हो गया था। उसने पार्टनरशिप रद्द करने का इकरारनामा भी बनवाया था, पुलिस ने बिना नोटरी के सत्यापित इकरारनामा के सत्यता की जाँच भी नहीं की।
अवैध फ़ैक्ट्री को घटना के दो महीने पहले जारी हुआ लाइसेंस-
पूर्णतः अवैध रूप से संचालित फ़ैक्ट्री को घटना के दो महीने पहले पर्यावरण सरंक्षण मंडल ने लाइसेंस अवधी को दिनांक 01/05/2015 से दिनांक 30/04/2018 तक बढ़ा दिया था, जबकि उससे पूर्व फ़ैक्ट्री के पास के कोई लाइसेंस नहीं था ,इस बात की पुष्टि औद्योगिक स्वस्थ्य और सुरक्षा अधिकारी उपसंचालक तिर्की ने किया था। तिर्की ने बताया था कि कंपनी प्रबंधन के पास कारखाना अधिनियाँ अंतर्गत कोई लाइसेसं नहीं जारी हुआ था, ना ही पर्यावरण विभाग से कोई एनओसी। घटना के दो महीना पहले जारी हुआ लाइसेंस प्लांट संचालक के पिता और पर्यावरण सरंक्षण मंडल के तत्कालीन जीएम एसके उपाध्याय ने जारी किया था।
गवाह ने अधिकारी को बेचीं कीमती जमीन-
इस घटना में तत्कालीन उरला टीआई मीना चौधरी और जाँच अधिकारी आरएस नेताम की भूमिका संदिग्ध है। पुलिस ने जिस सनत कुमार तिवारी को गवाह बनाया था वह भी कंपनी प्रबंधन के गांव मूल रूप से रीवा का निवासी था। सनत ने विशेष रेलवे मजिस्ट्रेट विजेंद्र सोनवानी की कोर्ट में 20 जनवरी 2021 को गवाही देने के पांच दिन पूर्व ही अपनी जमीन फ़ैक्ट्री संचालक के पिता संतोष उपाध्याय को साढ़े पांच लाख रुपये में बेचा था। जिससे स्पष्ट होता है कि गवाह और आरोपित पूर्व परिचित थे।
विशेष न्यायाधीश श्री सोनवानी ने 28 जुलाई 2021 को आरोपितों को दोषमुक्त कर दिया और फैसले में कहा कि “अभियुक्त भालेंद्र उपाध्याय के द्वारा लापरवाही बरतने के कोई भी साक्ष्य नहीं मिले, सिर्फ कंपनी संचालक होने के चलते दोषी नहीं ठहराया जा सकता।” अब सवाल उठता है कि मजदुर प्रभा, हेल्पर तरुण सोनी, मेटाडोर चालक दिलीप मिश्रा और पुष्पेंद्र तिवारी के अकाल मौत का जिम्मेदार कौन है?
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