मनपसंद विभाग से हटाने पर कर्मी हुआ नाराज, कुलपति और रजिस्ट्रार के खिलाफ दायर की याचिका

रायपुर 26 फरवरी 2022.  प्रदेश के पत्रकारिता विश्वविद्यालय में सिरफुट्टोवल की स्थिति है। फर्जी दस्तावेजों के सहारे पिछले दरवाजे से स्टेनोग्राफर बने कर्मचारी ने कुलपति और रजिस्ट्रार को कोर्ट परेड कराने याचिका दाखिल किया है। दरअसल पूरा विवाद 7 फरवरी को रजिस्ट्रार द्वारा कर्मचारियों के विभागो में किये बदलाव के बाद शुरू हुआ है। रजिस्ट्रार आनंद शंकर बहादुर ने 7 फरवरी को आदेश जारी कर कर्मचारियों के विभागों में फेरबदल किया जिसमे देवीसिंग पाटिल, आकाश चंद्रवंशी, वैशाली गोलाप, रूपेंशवर गावड़े, चंद्रशेखर शिवहरे और अविनाश कार्डेकार के विभागों में बदलाव किया। कुलपति सचिवालय में लम्बे समय से अंगद की तरह पैर जमाये शीघ्रलेखक अविनाश कार्डेकार को अध्ययन शाला जनसंचार विभाग में अटैच किया गया। जिससे बौखलाए अविनाश कार्डेकार ने रजिस्ट्रार के आदेशों को गलत ठहराते हुए कोर्ट में चुनौती दी है, जिसे लेकर अनेक चर्चाये हो रही है।


जानकारी अनुसार याचिका में अविनाश ने कोर्ट से कहा है कि उसकी नियुक्ति साल 20101-12 में शीघ्रलेखक ग्रेड 3 के पद नियुक्ति हुई थी, तब से वे कुलपति सचिवालय में पदस्थ थे। ऐसे में उन्हें स्टेनोग्राफर काम से हटाकर से हटाकर लिपिकीय काम दिया गया है.. जो गलत है। ऐसे में उन्होंने 7 फरवरी को जारी आदेशों को क्वेश करने निवेदन किया है। बताते है कि अविनाश कुलपति सचिवालय में पदस्थ रहने के दौरान अपने को कुलपति का निज सहायक प्रचारित करते थे। परिस्थितिया ऐसी निर्मित थी कि कुलपति से मिलने पहले अविनाश से मिलना जरुरी था तब जाकर लोगो की कुलपति से मुलाकात संभव होती थी। जिसके चलते अधिकांश लोगो को कुलपति से मिले बिना बैरंग लौटना पड़ा था जिससे कुलपति बलदेव भाई शर्मा की नकारात्मक छवि बनी तो अविनाश का दबदबा था। कार्य विभाजन में बदलाव होने पर रुतबा ख़त्म होने से बौखलाए अविनाश कार्डेकर ने भौकाल बनाये रखने कुलपति और कुलपसचिव को कोर्ट परेड कराने याचिका दाखिल किया है। जानकारों के अनुसार अविनाश की नियुक्ति शीघ्रलेखकग्रेड 3 पर हुई थी, वहा से निज सहायक बनने तीन प्रमोशन की दरकार है।

अविनाश कार्डेकर की नियुक्ति फर्जी दस्तवेजो के सहारे बैक डोर से हुई। उनका निवास प्रमाण पत्र फर्जी है, जिसकी शिकायत पर विश्वविद्यालय प्रबंधन ने से हुई थी पर प्रबंधन ने आँख मूंद लिया था, अगर कार्यवाही करते तो संभवतः ऐसी परिस्थितिया निर्मित नहीं होती। विश्वविद्यालय से अविनाश कार्डेकर और शिवहरे की करीब दर्जनों शिकायते हुई पर प्रबंधन ने सरंक्षण दिया। अविनाश कार्डेकर और चंद्रशेखर शिवहरे की निवासी संबंधी दस्तावेज फर्जी और कूटरचित है जिसका मामला उच्च न्यायालय में प्रक्रियाधीन है। जानकारी अनुसार कोर्ट द्वारा जारी नोटिस का जवाब विश्वविद्यालय प्रबंधन सहित दोनों ने छह महीने बाद भी नहीं दिया है। चर्चाये है कि विश्वविद्यालय प्रबंधन की अनुमति बिना कोर्टमें याचिका दायर की गई है, जो अनुशासनहीनता है। फर्जीवाडा, वित्तीय अनियमितता, भ्रष्ट कर्मियों को सरंक्षण देने और धोखाधड़ी संबंधी आरोप लगते रहे है। ऐसे में जिस कर्मचारी को विश्वविद्यालय प्रबधन ने सरंक्षण दिया उसी ने कोर्ट में याचिका दायर कर उनके आत्मसम्मान चौराहे में टांग दिया है। इस मसले पर कुलपति और कुलसचिव से दूरभाष से बात करने कोशिश की गई पर नो रिस्पांस रहा।

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