राहुल गिरी गोस्वामी
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रायपुर 6 मई 2022. प्रदेश के सबसे बड़े और पुराने पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय को ग्रहण लग गया है, ग्रहण ऐसा की सब बिकने को तैयार है। साल 1964 में अविभाजित मध्यप्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री पंडित रविशंकर शुक्ल के नाम पर शुरू हुए इस विश्वविद्यालय की 58 साल बाद दीवारे दरकने लगी है। अविभाजित मध्यप्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री श्री रविशंकर शुक्ल जी ज्ञानी और ऋषि पुरुष थे, उनके नाम से शुरू हुये इस विश्वविद्यालय ने बीते 58 सालो में बड़े प्रशासनिक अधिकारी, नामचीन पत्रकार और उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले खिलाडी दिए जिन्होंने विश्वविद्यालय का गौरव बढ़ाया और समूचे देश ने छत्तीसगढ़ का नाम रौशन किया। वर्तमान में विश्वविद्यालय की दरकती दीवार, बिकती कुर्सियां और लुटती ईज्जत को देखकर जरूर उन्हें दुःख पहुंचा होगा। इतने बड़े विश्वविद्यालय की ऐसी दशा आखिर क्यों हुई, इसका जिम्मेदार कौन है? इस पर कोई बात नहीं करना चाह रहे है।
रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय छत्तीसगढ़ का सबसे बड़ा और पुराना विश्वविद्यालय है जिससे 144 महाविद्यालय संबद्ध है। करीब 300 एकड़ जमीन के मालिक विश्वविद्यालय की कुर्सियां बिक जाये, कुलपति को किराये की कार से चलना पड़े तो विश्वविद्यालय का दुर्भाग्य है। विश्वविद्यालय की नीलाम होती संपत्ति और समाचार पत्रों में भ्रष्टाचार और गड़बड़ियों की छपती खबरो के बाद भी प्रबंधन के जिम्मेदारों को शर्म नहीं महसुस हो रही है। रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय बीते डेढ़ महीने भ्रष्टाचार, धरना, आंदोलन और पदोन्नति, भूख-हड़ताल को लेकर मीडिया में छाया हुआ है। रविशंकर विश्वविद्यालय में बीते साठ वर्षो में जो नहीं हुआ वह विगत कुछ वर्षो से हो रहा है जिसका परिणाम ही है कि मीडिया की सुर्खिया बटोर रही है। मसला जमीन और उसके मुआवजे का जिसे समय रहते सुलझाया जा सकता था पर जिम्मेदारों ने इससे पल्ला झाड़कर कंबल ओढ़कर घी पीते रहे। साल 2005 से चल रहे प्रकरण को सुलझाया जा सकता था पर विश्वविद्यालय प्रबंधन के जिम्मेदार कुलपति और कुलसचिव ने कोशिशे नहीं की या वैसी कोशिशे नहीं की जैसे उन्हें करनी चाहिए थी। जिसका खामियाजा आज विश्वविद्यालय की कुर्सी टेबल बेचकर चुकाना पड़ रहा है। साल 2019 में पहली बार कोर्ट ने कुर्की संबंधी नोटिस जारी किया तभी इसे विधिवत सुलझाया जा सकता था पर विश्वविद्यालय प्रबंधन वकीलों के भरोसे चैन की नींद सोया रहा। आखिर में जमीन लौटाने संबंधी फैसला कार्यपरिषद में प्रस्तावित किया जो बेहद नासमझी भरा फैसला है। 15 वर्ष पहले मुआवजा देकर अधिग्रहित की गई जमीनों वापस लौटने का फैसला सिर्फ इसलिए करना पड़ा की उन्हें मुआवजा देने विश्वविद्यालय प्रबंधन के पास पैसा नहीं था ऐसे फैसले प्रबंधन की सूझबूझ का स्तर भी दिखाती है उन्हें हसी का पात्र भी बनातीं है। दरअसल इस पुरे प्रकरण के विश्वविद्यालय प्रबंधन की सुस्ती का कारण करोडो की बेशकीमती जमीने है जिसमे भूमाफियाओ की नजर है और कथित तौर पर प्रबंधन के जिम्मेदार भी शामिल है।
1 मई को दीनदयाल उपाध्याय ऑडिटोरियम में रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय ने अपना 59वां स्थापना दिवस मनाया जिसमे बतौर मुख्य अथिति उच्च शिक्षा मंत्री उमेश पटेल भी शामिल हुए थे। वहा विश्वविद्यालय के गिरती साख पर चर्चा नहीं हुई बल्कि जिम्मेदारों ने खाली पड़े पदों को भर्ती करने की मांग मंत्री से की गई जबकि आवश्यकता नीलामी प्रक्रिया को रोकने और साख को बचाने की है। मंत्री उमेश पटेल ने भी फरियादियो के सुर में सुर मिलाकर जल्द भर्ती करने का आश्वासन दिया पर बिकते कुर्सी टेबल पर चर्चा नहीं की। समय की मांग थी कि तत्काल कुलपति और उच्च शिक्षा विभाग के अधिकारियो की बैठक लेकर मामले को सुलझाने की कोशिश की जाती पर स्मार्ट बोर्ड के गुणगान, गार्डन और बंजारी मंदिर ट्रस्ट तक सिमित रही। बीजेपी सरकार में उच्च शिक्षा मंत्री प्रेमप्रकाश पांडेय इस मामले में बेहद तेज तर्रार थे वे कुलपतियो की परेड कराने से नहीं चूकते थे। इस पुरे विवादों में जो एक बात जो सामने आया कि विश्वविद्यालय के जिम्मेदार कुलपति और कुलसचिव ने समय रहते सही फैसला नहीं लिया अगर वे समय में सही फैसला करते तो कांग्रेस की सरकार में रविशंकर विश्वविद्यालय के सम्मान की नीलामी ना होती। इस विश्वविद्यालय को प्रतिनियुक्ति पर समय काटने वाले कुलसचिव की नहीं धर्मेश साहू जैसे प्रशासनिक अधिकारियो की जरुरत है जो सही समय पर सही फैसला लेने में सक्षम थे।

