रायपुर 06 अगस्त 2022. संवाद में प्रकाशन विशेषज्ञ पद पर हुई नियुक्ति में तत्कालीन अधिकारियो ने बड़ी गड़बड़ी की। अधिकारियो ने भर्ती प्रक्रिया में दस्तावेजों का सही सत्यापन नहीं किया और नियुक्ति कर दी, जिसका लाभ अपात्र होने के बाद भी चयनित कर्मी को मिल रहा है। इसकी शिकायत साल 2008 से लेकर 2013 में करीब छह बार हुई। मुख्यमंत्री के विभाग में आधा दर्जन शिकायतों के बाद साल 2013 में में बने जाँच समिति की रिपोर्ट ने गड़बड़ी को प्रमाणित किया । समिति में अपर संचालक स्वराज दास, जवाहरलाल दरियो और पूरनलाल वर्मा शामिल थे। समिति ने जाँच रिपोर्ट तत्कालीन आयुक्त को भेजा पर फाइल दबा दी गई। बताते है कि पूर्व की सरकार में सब्यसाची कर का दबदबा था जिसके चलते आधा दर्जन से अधिक गंभीर शिकायतों के बाद भी कार्यवाही नहीं हुई और जाँच रिपोर्ट ही दबा दी गई। वर्तमान सीईओ की कार्यशैली पूर्व में रहे अफसरों से अलग है, ऐसे में कार्यवाही की उम्मीदे है।
ऐसी हुई गड़बड़ी..
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छत्तीसगढ़ संवाद में साल 2001 में प्रकाशन विशेषज्ञ पद पर संविदा नियुक्ति के लिए विज्ञापन जारी हुआ। विज्ञापन में जारी शर्तो में एक आवश्यक शर्त मान्यता प्राप्त संस्था से प्रिंटिंग टेक्नोलॉजी में प्रथम श्रेणी में पास होना और ग्राफ़िक डिजाइनिंग में दक्ष होना आवश्यक था। चयनित अभ्यर्थी सब्यसाची कर के पास वांछित डिग्री/डिप्लोमा नहीं है उसके बाद चयन प्रक्रिया में शामिल रहे अफसरों ने लाभांवित किया। जाँच समिति की रिपोर्ट के अनुसार सब्यसाची ने यूनिवर्सिसिटी ऑफ़ लंदन से ग्राफ़िक डिजाईन की परीक्षा डी श्रेणी से उत्तीर्ण किया है जबकि वांछित योग्यता प्रिंटिंग टेक्नोलॉजी में एक्सपर्ट होना था। सब्यसाची ने अपने बचाव में दोनों को एक होना बताया पर सच्चाई है कि दोनों ही अलग-अलग है। उन्होंने विदेश से ग्राफ़िक डिजाइन में डिप्लोमा किया है ना की प्रिंटिंग डिजाइन में। सब्यसाची ने नोटिफिकेशन ऑफ़ परफॉमेंस ऑन ए बीटीईसी अप्रूवड प्रोग्राम से संबंधित ग्राफ़िक डिजाइन का डिप्लोमा सर्टिफिकेट जमा किया जिसमे किसी भी अधिकृत व्यक्ति के सिग्नेचर नहीं है। चयन समिति ने सब्यसाची द्वारा जमा दस्तावेजों की फोटो कॉपी को ही मान्य कर दिया था, मूल दस्तावेजों के सत्यापन नहीं किया।

फर्जी अनुभव प्रमाण पत्र, समिति को गुमराह करने कोशिश..
अभ्यर्थी रहे सब्यसाची कर ने मेसर्स युगबोध डिजिटल प्रिंटर्स रायपुर का दिनांक 04-11-2001 को जारी पत्र को बतौर अनुभव प्रमाण पत्र जमा किया था जिसमे उसने 5 वर्षो का कार्यानुभव बताया। समिति द्वारा जाँच में पत्र फर्जी पाया गया क्योकि उक्त संस्था तीन साल पहले ही साल 1998 में रजिस्टर्ड हुई थी जिसमे सब्यसाची ने 5 वर्षो के कार्यनुभव बताया था। जांच समिति को गुमराह कर जाँच रोकने सब्यसाची ने संवाद के पूर्व कर्मचारी मोहन मिश्रा द्वारा उच्च न्यायालय में लगाए गए याचिका का हवाला दिया, ताकि शिकायतों की जाँच ना की जा सके जबकि कोर्ट ने सब्यसाची कर के विरुद्ध किसी भी प्रकार के विभागीय जाँच पर रोक नहीं लगाया था।
संविदा में पदस्थ सब्यसाची ने रेगुलर करने की मांग की, इसके लिए उन्होंने कोर्ट में याचिका भी दाखिल किया पर राहत नहीं मिली। उन्होंने विभाग से विधिवत अनुमति बिना ही कोर्ट में याचिका दाखिल किया था। दरअसल संवाद में स्वीकृत सेटअप 08 पद में 7 पदों पर विभागीय स्थाईकरण समिति ने जाँच उपरांत स्थाईकरण की अनुशंषा की। जनशिकायत निवारण प्रकोष्ट में शैक्षणिक योग्यता और अनुभव प्रमाण पत्र के संबंध में शिकायत लंबित होने और उच्च न्यायालय में याचिका पेंडिंग होने से स्थाईकरण नहीं किया गया। सब्यसाची ने फर्जी दस्तावेजों के सहारे 22 वर्षो से जमे है और अपनी रेगुलर नियुक्ति के लिए उन्होंने विभाग को कोर्ट में घसीट दिया। इस प्रकरण में संचालक जनसम्पर्क सौमिल रंजन चौबे से कार्यवाही संबंधी जानकारी चाही गई पर उन्होंने फ़ोन/मैसेज का जवाब नहीं दिया।
