बालिका गृह में दुष्कर्म, सवालो में महिला बाल विकास के अधिकारी.. एनजीओ पर मेहरबानी !

o मंत्री और संचालक दोनों ही महिला वहा नाबालिक के साथ ऐसा कृत्य
o एनजीओ की नहीं हुई जाँच, 
रायपुर 05 अक्टूबर 2022.  एक बालिका गृह में नाबालिक के साथ दुष्कर्म और जाँच की लीपापोती ने महिला अधिकारों और सुरक्षा की पोल खोल दी है। साल भर पहले उक्त मामला सामने आने के बाद अफसरों ने खानापूर्ति कार्यवाही कर रफा दफा कर दिया था, जाँच रिपोर्ट सामने आने के बाद विभागीय अफसरो की लापरवाही सार्वजानिक हो गई है। साल भर पहले एक बालिका गृह सरंक्षण गृह में 14 वर्षीय बालिका के साथ बाल सरंक्षण गृह में निवासरत किशोर ने दुष्कर्म किया था। नाबालिक के छह महीने की गर्भवती होने पर महिला बाल विकास विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों को घटना की जानकारी हुई फिर पुलिस कार्यवाही की औपचारिता की गई।
पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर बालिग़ हो चुके आरोपित को जेल भेज दिया और जाँच बंद कर दी। विभागीय अफसरों ने इस गंभीर कृत्य की गहन जाँच नहीं की और मामले को ठन्डे बस्ते में डाल दिया। घटना के साल भर बाद जाँच रिपोर्ट और पुलिस की थ्योरी में असमानता के बाद हंगामा मच गया है। दरअसल महिला बाल विकास के अफसरों ने घटना को महीनो तक दबाये रखा, जब युवती छह महीने की गर्भवती हुई तो मामला सार्वजनिक हो गया। आनन फानन में अधिकारियो ने क़ानूनी कार्यवाही की।
विभागीय अफसरो की लापरवाही-
युवती के गर्भवती होने की जानकारी होने के बाद महिला बाल विकास विभाग के डीपीओ और जिला बाल सरंक्षण अधिकारी ने गंभीर चूक की। उन्होंने इस पुरे मामले की जाँच की बजाये दबाये रखा। वही संचालनालय में पदस्थ अधिकारियो ने भी नाबालिक से दुष्कर्म संवेदशील मामके पर गंभीरता नहीं दिखाया। जिसके चलते घटना की वास्तविक स्थिति और सच्चाई सामने ना आ सकी। जाँच रिपोर्ट के अनुसार दुष्कर्म केस में जेल में बंद आरोपित बच्चे का जैविक पिता नहीं है। ऐसे में आशंका है कि कुछ अन्य लोगो ने भी युवती के साथ गलत कृत्य किया होगा। युवती के मानसिक रूप से अस्वस्थ्य होने से आरोपितों की सही जानकारी नहीं मिल पाई और पुलिस ने आरोपित को जेल भेज केस बंद कर दिया था।
अंतर्राष्ट्रीय एनजीओ..
बालिका सरंक्षण गृह का सञ्चालन का जिम्मा एक अंतर्राष्ट्रीय एनजीओ को दिया गया है जो बीते कुछ वर्षो से इसका सञ्चालन कर रहा है। एनजीओ मूलतः ऑस्ट्रिया का है। उक्त एनजीओ दुनिया भर के 135 देशो में बाल सुधार के कार्य करती है। जानकारी अनुसार प्रदेश में बालिका गृह के सञ्चालन का जिम्मा उसे दिया गया है, जिसके लिए उसे सालाना करीब डेढ़ करोड़ रुपये भुगतान किये जाते है। घटना में एनजीओ की भूमिका संदिग्ध है। दरअसल एनजीओ ने बालिका सुधार गृह में एक हाउसमदर रखा था जिसे घटना के बाद हटाकर दिल्ली और एक अन्य कमर्चारी को दूसरे स्टेट भेज दिया। जिससे पुलिस ने उक्त हाउसमदर और अन्य कर्मचारी की भूमिका की जाँच और बयान दोनों नहीं ले पाई। नियमतः पुलिस को एनजीओ के संचालको से पूछताछ और विभागीय अफसरों को एनजीओ पर कार्यवाही करना था, पर दोनों ही नहीं पाया। साल भर बाद प्रकरण के तथ्यात्मक सामने आने और जाँच रिपोर्ट मीडिया तक पहुंचने से विभागीय अफसर हैरान है।

महिला बाल विकास का अजब हाल, पहले आदेश जारी फिर संसोधन.. गैर जिम्मेदार अफसरों ने संचालक की बढ़ाई मुश्किलें

error: Content is protected !!