अंदरूनी खबर: आसान काम नहीं कुलपति बनना..

अंदरूनी खबर
09 दिसंबर 2022
किसी भी विश्वविद्यालय में कुलपति का पद सबसे बड़ा, जिम्मेदार और महत्वपूर्ण माना जाता है, ऐसे में कुलपति पर ही अगर कोई आरोप लगने लगे तो उस संस्थान की स्थिति को समझा जा सकता है। पुरे देश में उच्च शिक्षा संस्थानों में उच्च शिक्षा का हाल नाम के विपरीत है जिसका बड़ा कारण संस्थान प्रमुखों पर लगने वाले गंभीर आरोप और उनका ऐसे कृत्यों में शामिल होना प्रमुख है। दरअसल वर्तमान परिवेश में अधिकांश विश्वविद्यालयो के कुलपति पठन-पठान और शोध के अलावा उन कामो में जुटे रहते है जिसमे उन्हें आनंद आये और आनंद की अनुभूति लक्ष्मी दर्शन से होती है। अब कुलपति बनना भी बहुत आसान नहीं है, उसके लिए बहुत कठिन परिश्रम, राजनीतिक पहुंच और अंतिम में दस वर्ष का प्रोफेसरशिप होना जरुरी है। ऊंची राजनीतिक पहुंच और फंड का सही इस्तेमाल करने की काबिलियत होने पर दस वर्षो की प्रोफेसरशिप गौड हो जाती है।
देश के कुछ हिस्सों में ऐसे ही शिकायते कुलपतियों को लेकर रही की दस वर्षो के बिना प्रोफेसरशिप बिना ही कुलपति बन गए। अल्मोड़ा (उत्तराखंड) के सोबन सिंह जीना अल्मोड़ा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफ़ेसर एन.एस. भंडारी को ऐसे ही शर्तो का उल्लंघन करने पर उच्च न्यायालय ने हटा दिया। वही इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ संगीता श्रीवास्तव के खिलाफ इलाहाबाद उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल की गई है ,जिसमे बताया वे निर्धारित योग्यता को पूर्ण नहीं करती फिर भी कुलपति बन गई। कोर्ट ने याचिका स्वीकार कर नोटिस जारी कर जवाब माँगा है। ऐसा ही घटनाक्रम प्रदेश के एक विश्वविद्यालय में हुआ, जहा निर्धारित योग्यताओ को पूरा नहीं करने पर भी कुलपति बना दिया गया। कुलपति बनाने सत्ता पक्ष और विपक्ष सबकी भूमिका रही तो कुलाधिपति कार्यालय ने भी रियायत दे दी। अब विश्वविद्यालय में घटने वाले घटनाक्रम और गतिविधियों का अंदाजा लगाया जा सकता है। यहाँ की स्थिति भी इलाहाबाद और अल्मोड़ा विश्वविद्यालय जैसा अगर हो जाये तो आश्चर्य न होगा।

 

 

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