रायपुर 4 सितंबर 2022. समाज कल्याण विभाग में निराश्रित और गरीबो के निराश्रित निधि में योजनाबद्ध तरीके से सेंध लगाई गई। संचालनालय में बैठे अफसरों ने जिलों में बैठे अफसरों को एडवांस पेमेंट देते रहे। इस पुरे प्रकरण की स्वतंत्र बोल ने पड़ताल की चौकाने वाले तथ्य सामने आये। ऑडिट रिपोर्ट में पुष्ट हुए गड़बड़ी को दबाने भी प्रयास किया जा रहा है। दस्तावेजों के अनुसार कोष लेखा पेंशन विभाग ने साल 2018 में ऑडिट रिपोर्ट सबमिट किया, जिसमे करोडो की अनियमितता की पुष्टि की, और तब से गड़बड़ी को दबाने का खेल जारी है। ऑडिट रिपोर्ट की गई वित्तीय अनियमितता संबंधी आपत्तियों पर संचालनालय समाज कल्याण विभाग से संयुक्त संचालक पंकज वर्मा ने जवाब भेजा, जिसके अनुसार “कही कोई गड़बड़ी और अनियमितता नहीं हुई और सब सुधार लिया गया है”।

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साल 2011 से लेकर 2018 तक आठ सालो तक गड़बड़िया की गई। अधिकारी दिव्यांगों, निराश्रितों और विकलांगो का पैसा डकार गए। इस रिपोर्ट के बाद संबंधित अधिकारीयो पर कार्यवाही और रिकवरी की बजाये मामले को ठन्डे बस्ते में डालने का खेल चल रहा है। ऑडिट की रिपोर्ट पर समाज कल्याण के संयुक्त संचालक द्वारा भेजे गए जवाब ने स्पष्ट कर दिया कि विभाग में मनमानी चरम पर है और यहाँ कैशबुक की बजाये कम्प्यूटराइज्ड कैशबुक में एंट्री की जाती है। सभी सरकारी विभागों में कैशबुक (रोकड़ पंजी) में एंट्री की जाती पर समाज कल्याण के अफसरों ने कम्प्युटराइज्ड कैशबुक उपयोग किया। जिससे संभावना ऐसी कि कम्पूटराइजड कैशबुक को बैक डेट में सुविधानुसार अपडेट किया जा सकता है जबकि रोकड़ पंजी को नहीं। वही इंडसइंड, एचडीएफसी सहित अन्य बैंको के गायब 8 चेको के बारे में बताया कि सात चेक को निरस्त किया गया और एक चेक से यूनियन बैंक ऑफ़ इंडिया को 29 लाख रुपये ट्रांसफर किये गए, ट्रांसफर किसे और क्यों किये गए इसका उल्लेख नहीं है।
पहले खर्च फिर समायोजन-
निराश्रित निधि से विभिन्न जिलों के उपसंचालको को करीब 28 करोड़ 34 लाख रुपये जारी किया गया पर उसके खर्च का ब्यौरा नहीं मिल पाया। संचालनालय से आबंटित भारी भरकम राशि उपसंचालको द्वारा खर्च किया गया पर उसका हिसाब नहीं मिल सका। अधिकारी ने संबंधित जिलो के उपसंचालको से जानकारी जुटाई पर उसमे सिर्फ 70 फीसदी राशि खर्च की जानकारी मिली, जिसे अगले वित्तीय वर्ष में समायोजन करने की बाते कही गई बाकी 30 फीसदी राशि करीब साढ़े आठ करोड़ रुपयों का हिसाब गड़बड़ है।
वही पूर्व उपसंचालक राजेश तिवारी को साल 2012 में एडवांस दिए गए 5 लाख रुपये को विभाग साल 2016 तक वसूली नहीं कर पाया, कोष लेखा द्वारा आपत्ति के बाद संयुक्त संचालक का तर्क है कि खर्च और भुगतान की जानकारी राजेश तिवारी ने दिया पर त्रुटिवश उसे जमा नहीं किया जा सका था, इसलिए वसूली का प्रश्न नहीं उठता। जबकि राजेश तिवारी ने उक्त राशि किसमे खर्च की उसका हिसाब नहीं है।
अब तक जिम्मेदारी तय नहीं-
गड़बड़ी और वित्तीय अनियमितता की पुष्टि होने पर बीते चार वर्षो से करोडो की गड़बड़ी पर लीपापोती की जा रही है। जिम्मेदार गड़बड़ी करने वाले अफसरों को बचाने में जुटे है। विभाग में हुए इस बड़े भ्रष्टाचार की अभी और परते खुलेगी तो बड़े फैक्ट्स सामने आएंगे।
