रायपुर 1 अप्रैल 2022. प्री स्कूल किट खरीदी में गड़बड़ी के दोषी सहायक संचालक को सरंक्षण देने में मंत्रालयीन अफसर जुटे हुए है। जिसके चलते अब तक कोई कार्यवाही नहीं हुई है। साल 2019 में बालोद जिले में प्री स्कूल किट खरीदी में फर्जीवाड़ा उजागर हुआ था जिसमे तत्कालीन डीपीओ समीर पांडेय ने नियमो को दरकिनार कर एक सहायक संचालक के करीबी एके इंटरप्राइज़ेश और बाबूलाल जायसवाल को आपूर्ति का टेंडर जारी किया था। जिसमे बिना सामान आपूर्ति के तत्कालीन डीपीओ ने लाखो का भुगतान कर दिया था, जिससे ना केवल शासकीय धन का अपव्यय हुआ बल्कि नियमो का उल्लंघन भी हुआ। विभागीय अफसर दो वर्षो तक कलेक्टर की जाँच रिपोर्ट को दबाये रखे और अब मामला सामने आने के बाद भी एक फिर बचाव में लगे है।
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जानकारी अनुसार मंत्रालय में पदस्थ सेक्शन ऑफिसर ने इस प्रकरण में व्यक्तिगत रूचि दिखाया है। जिसके बाद कलेक्टर की जाँच रिपोर्ट को दरकिनार एक बार फिर जाँच रिपोर्ट डीपीओ बालोद से माँगा है। जबकि साल 2019 में तत्कालीन बालोद कलेक्टर के आदेशों पर एसडीएम, डिप्टी कलेक्टर और ट्रेजरी अफसर की संयुक्त टीम ने जाँच रिपोर्ट बनाया था। जिस पर कार्यवाही के लिए सचिव महिला बाल विकास को पत्र लिखा था, उसके बाद भी कार्यवाही सिफर है।
वर्षो से जमे सेक्शन ऑफिसर-
सामान्य प्रशासन विभाग के नियमानुसार कोई भी अफसर तीन वर्षो से तक प्रतिनियुक्ति पर रह सकता है। रत्तुलाल ध्रुव मूलतः जीएडी के कर्मचारी है जो विगत चार वर्षो से अधिक समय से महिला बाल विकास में जमे हुए है। मंत्रालय में आने वाली फाइलें सेक्शन अफसर से होकर ही सचिव तक पहुँचती है और वे ही फाइलें सचिव तक पहुँच रही है जिनमे कार्यवाही करनी होती है,, बाकी सेल्फ की शोभा बढ़ाती है।
अब तक ब्लैकलिस्टेड नहीं..
बालोद सहित प्रदेश के दर्जन भर से अधिक जिलों में प्री स्कूल किट आपूर्ति में गड़बड़ी करने वाली कंपनी एके इंटरप्राइजेस और बाबूलाल जायसवाल पर गड़बड़ी प्रमाणित होने के बाद भी अफसर कार्यवाही की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे है। दस्तावेजों के अनुसार दोनों ही कंपनियों ने लाखो की गड़बड़ी की, बिना सामान सप्लाई के भुगतान लिया। ऐसे में दोनों ही कंपनी को ब्लैकलिस्टेड करने की शिकायत हुई थी पर विभागीय अफसरों ने बजाये ब्लैकलिस्टेड करने के उन्हें सप्लाई का ऑर्डर दिया है। बताते है कि इन कंपनियों में आईसीडीएस के सहायक संचालक को शेयर होल्डर बताया जाता है जिसके चलते संचालक बड़े निर्णय नहीं ले पा रही है। संचालक का तर्क है कि कार्यवाही का अधिकार शासन को है जबकि विषय विशेषज्ञों का मानना है कि विभाग प्रमुख कंपनियों को ब्लैकलिस्टेड कर सकती है।
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